निर्भिग्य, कर्मठ, अनुशासित जीवन की पहचान डीसीपी श्वेता खेड़कर
23 जून 1978 को अमरावती जिल्हे में जन्मी पूर्णतः कार्य को समर्पित महिला अधिकारी श्वेता खेड़कर जी के व्यस्त समय के बीच उनसे उनके जीवन और विचार जानने का अवसर मिला उनसे बातचीत का कुछ भाग आपसे साजा करते है।
सवाल:- मैडम, आपने प्राथमिक शिक्षा कहा से ली और जीवन के शुरुआती दौर और कठिनाइयों के बारे में कुछ बताए?
जवाब :- मेरे पापा को–ऑपरेटिव बैंक मे कार्यरत थे, घर का माहौल अच्छा खासा होने के साथ-साथ बडे़ भाई का भी साथ मिला, मां गृहिणी थी और विशेषतः हमारी परवरिश में ध्यान रखती थी, मेरे साथ परिवार का साथ था कठिनाइयां समझ ही नही आती थी।
साथ ही मेरी प्रायमरी के दिनो से ही पढाई मे रुची थी, मैने माध्यमिक शिक्षा के बाद अध्यापन की शिक्षा मे रुची दिखाते हुए, अध्यापक की शिक्षा ली और मेळघाट मे जिल्हा परिषद स्कूल मे शिक्षिका की तौर पर प्रथम नौकरी कार्यभार संभाला था। वही से आगे की पढाई की प्रेरणा जगी बस स्टॉप में जब बस आने मे समय लगता था तब तक मैं वहीं पढ़ती रहती थी। सच कहूं तो, मैने समय ना गवाते हुए मन लगाकर सिर्फ पढाई पर ध्यान दिया, किसी भी तरह की कठीनाई से परेशान ना होकर फोकस केवल आगे की पढाई पर रखा, अधिकारी बनने की चाह थी, में एमपीएससी की तैयारी मे जुट गई, हात मे मोच, लिखने मे कठीणाई आने की वजह से, पढाई तो थी लेकिन लिखना नही हो पाने की वजह से भी काफी दिक्कत हुई, पर हार ना मानते हुए दर्द का ऑइनमेंट लगाकर हात को मालिश कर मैने परीक्षा दिया था।
सवाल :-आपने शुरुआती दौर में किस तरीके से एमपीएससी की तयारी की, मॉक इंटरव्यू और उस दौरान की कुछ विशेष घटना?
जवाब :-शुरूवात मे पढ़ाई कैसे करना है इसकी जानकारी नही थी तो पुना में आनंद पाटील सर का सेमिनार ज्वाइन करणे गये, लेकीन पता चला उनका शेड्यूल मुंबई मे था तो पुना में वैद्य सर का खचाखच भरा हुआ लेक्चर चालू था मै पीछे दरवाजे पर खडे रहकर लेक्चर सुन रही थी लेक्चर खत्म होने पर सर के पास गयी देखा सब लोग अपनी – अपनी क्वेरी पूछ रहे थे तो मैने भी सर से रिक्वेस्ट किया और पूछा कि, “पहली बार सिलेक्ट हुई हू सर बहुत कन्फ्यूजन है! कैसे तयारी करे?” उस समय की वो बातें मुझे याद है उनका जवाब ऐसा था की, “भई, आपकी जो हालत है, सभी एक ही नाव पर सवार है तुम्हारा फर्स्ट चांस हैं इसलिये तुम्हे ऐसा लग रहा, मै पास होऊंगी या नही यह डर आपको लग रहा है और जो लोगों ने परीक्षा दी है उनको ये डर लग रहा है कि, इस बार हम पास होंगे की नही” वहा से मै यही सिख लेके आई की, “सभी एक नाव पर सवार है” इसी वजह से ना घबराते हुए; जो कुछ भी होना है होगा फर्स्ट टाइम, सेकंड टाइम नही होता है हमे बस अपनी तयारी करनी है|
धर्माधिकारी सर का चाणक्य नाम का इंस्टीट्यूट हैं वहा पे मॉक इंटरव्यू थे वहां मॉक इंटरव्यू के लिए मैने अप्लाय कर दिया। वे हमारा पुरा इंटरव्यू व्हिडिओ रिकॉर्ड करते थे और हमे कमियां बताते थे की हमे किन बातों का ध्यान और कहां सुधार करना चाहिए। फिर, मॉक इंटरव्यू में मुझे प्रश्न पूछा गया था कि, मेरे बायोडाटा मे मेरी हॉबी मैने “सुष्क काष्ठ जमा करणे” याने सुखी लकड़ी की जो चीजे होती है उसे जमा करना बताया था, उन्होने मुझे पूछा की, “ये हॉबी लिखी है! इसको कैसे रिप्रेजेंट करोगी आप?” मैने जवाब दिया कि, “अभी तो मुझे पता नही है, लेकिन मै सीखूंगी” उन्होने कहा की, “ये जवाब मुझे बहुत अच्छा लगा की ; जो चीज हमे नही आती है, वो सीखने का जो आपने बोला वो पसंद है और आपका जवाब एकदम सीधा है की, आपने मान लिया की; हमे नही आता है तो वो मै सीखूंगी जरुरी नही है कि सभी चीजे एकही साथ आपको आनी चाहिए”। मैंने अपना पहला इंटरव्यू दिया रिजल्ट 527 पर लास्ट सीट गई और 526 मुझे मिले थे। पहिले अटेम्प्ट मे एक मार्क से मै चुकी थी तब पता चला की हम हमारे सही मार्ग पर है और मुझे और तयारी करनी चाहिए पर, दूसरे वर्ष के अटेम्प्ट में मेरा ऑपरेशन हुआ, और वहा से बराबर एक महीने में एग्जाम थी मैने डॉक्टर्स और बाकी सबकी भी नहीं सुनी और जोर जबरदस्ती अपनी किताबें मंगवा बेड पर ही सब तयारी की; फिर भी उसमे तीन मार्क कम मिले आखिरकार तीसरे अटेम्प्ट मे मेहनत सफल हुई और मै पास हो गई। परिवार मे कोई पोलीस मे नही था| लेकिन जब ये नोकरी आई तो आजू-बाजू के लोगों को लगता था की मै ज्वाइन करूंगी या नही लेकीन मैने मा–पिताजी का आशीर्वाद लेकर ज्वाइन कर लिया था।
सफलता हमे मिलती है बस, प्रयास नही छोड़ना चाहिए।
सवाल:- आपने पहेली नोकरी कहा ज्वाइन की थी और अब तक का कार्यकाल क्या रहा है?
जवाब:- 2006-07 मे प्रोबेशन पिरेड सांगली मे हुआ पहली पोस्टिंग तुमसर में एस.डी.पी.ओ मिली उस वक्त खैरलांजी हत्याकांड हो गया काफी परेशानियाँ लगती थी क्या होंगा? कैसे क्षेत्र को शांत व अनहोनी से सुरक्षित रखें? शुक्र है सभी ऑफिसर का साथ मिला ऐसे मैं सीखते गई। वहा तीन साल रहने के बाद, 2010-14 एसीपी क्राइम व ट्रैफिक अमरावती मे रही उसके बाद फिर प्रमोशन होने से एडिशनल एसपी बुलढाणा तीन साल रही उसके बाद नागपूर में ईओडब्ल्यू कार्यालय मे पोस्टिंग मीली उसी दौरान कोरोना काल मे विशेष शाखा का अतिरिक्त पदभार भी मिला।
इस काल मे इलेक्शन आया, करोना आया, डॉक्युमेंटेशन बहोत था अलग–अलग परिस्तिथियां आती गई कार्य करती गई क्युकी मेरा मानना है के आपका कार्य ही आपको पहचान दिलाता है। पूरी लगन के साथ अपने कार्य को करें कठिनाइयां आएगी पर सफलता भी मिलेगी।
सवाल:- जब आपको अतिरिक्त विशेष शाखा का पदभार 2019 मे मिला हुआ था कोरोना काल मे उस वक्त क्या परिस्थिती थी?
जवाब :-ऑगस्ट महिने मे हमारा इलेक्शन हुआ, उद्धव ठाकरे साहेब के कार्य काल में पांच दिन का अधिवेशन था और उसी दौरान एन.आर.सी. के मोर्चे और उसके बाद अधिवेशन हो गया और फरवरी बजेट सेशन चल रहा था उसी दौर में मुझे कलेक्टर, विपीन जी इटनकर सर का फोन आया और उन्होने बोला की “श्वेता एक पेशंट का ब्लड सैंपल लिया और वो पेशंट पॉजिटिव आया है वो कलमना चला गया उसे कैसे भी करके ढूंढो” मे बोली “ठीक हैं सर और मैंने वाकी टॉकी पर संदेश भेजा की ऐसा – ऐसा नाम का एक व्यक्ती है और कलमना के तरफ गया है वह कोरोना पॉजिटिव है उसे ढूंढ के लाओ” लेकिन मुझे तुरंत बाद अहसास हुआ की, हमारे लोग तो जायेंगे और उसे ऐसे ही पकडकर गाडी मे बिठालकर लायेंगे ये गलत हो जाएगा। तो मैने फिर से तुरंत कॉल किया और बतायाँ की, “उसे पकड कर नही लाना है उसे सिर्फ संपर्क करे और वह कहा है देखे और उसे कुछ दूरी पर रख कर बाजू करे और बाद में एंबुलेंस में उसे लेकर आयेंगे” बाद मे हमने कलेक्टर साहब को बताए कि, हमारे लोगो को सीधे पकड़ने की आदत है तो जाकर पकड़ लायेंगे उसको ये गलत हो जायेगा इसपर कलेक्टर सहाब ने भी बराबर है बोला तब हमने कहा की, “सर आप टीम भेजिए” | तब तक हम उसको ढुंढ लेते है और वैसे ही हुआ कोई भी समय आए तो सूज – बुज और समझदारी ही हमारे काम आती है। यह सीखने को मिला और सीख ही रहे है तो सदैव जीवन मे हमे सिखते रहना है।
उस दिन, डीसीपी मैडम की सूझबूझ से बड़ा हादसा टल गया उसे ऐसा पकड़ा गया की उस व्यक्ति के द्वारा कोई संक्रमित नही हो पाया।
सवाल:- कोरोना काल के बंदोबस्त में आपका अनुभव किस तरह का था?आपने किस तरह से अपनी जिम्मेदारीया संभालते हुए कार्य किया?
जवाब :- यह बंदोबस्त जिंदगी में सभी ने पहली बार किया लॉ इंप्लीमेंटेशन करते हुए, बहुत सी अड़चनों का सामना करना पड़ा था लोगो को कोरेंटाइन करना, उन्हें अलग – अलग जगह पर रखना, यहाँ जाये– घर के अंदर जाये -बाहर मत निकलिए और इसका डॉक्युमेंटेशन भी बहोत था अलग – अलग मीटिंग से जो डायरेक्शन आते थे उन्हे इधर- उधर सर्कुलेट करना था और इंपोर्टेंट बात यह थी की, मै अगर कोरोना संक्रमन के डर सें काम नही करूंगी; तो मेरे जो बाकी सब साथी है, वो कैसे काम करेंगे? इस वजह से हमने क्या किया की, पुराने एसपी ऑफिस मे एक हॉल बनाया वहा एक टेबल रखकर सब लोग कुछ दूरी में बैठते थे और बार- बार टेबल पोछना, फाईल सैनिटाइज करना लेकिन फिर भी इन सब चीजों में हमारे लोगो ने बहुत काम किया। सेंटर मे कितने घर है? कितने लोग कोरंटाईन है |कही कुछ समस्या तो नही है| या कभी भी कुछ भी कॉल होते तो कोरन टाईम करना है, तो यहा बंदोबस्त भेजीये याने हर दिन अलग अलग स्वरूप के बंदोबस्त है, उन्हे चेक आउट करो, उसमे सुधार लाव याने लिटरली उस वक्त हमारे फॅमिली मेंबर यहा हमारे पास आ चुके थे और मेरे भाई साहब मेरे शूज, मेरा युनिफॉर्म- गाडी स्प्रेइंग करके रखना, याने मैं मेरी खुद की केअर नही कर पा रही थी उस वक्त इसलिये वो लोग मेरी केयर करते थे | उस वक्त मुझे इतना बुरा लगता था कि, किसी की मदर गुजर गई है| और उन्हे ट्रान्सपोर्टेशन के लिये परमिशन की जरुरत पडती थी उस वक्त ऑनलाईन मे गडबडी आती थी उस वक्त लोग जब मेरे पास आते थे तब उनका सब रेकॉर्ड लेके उनको परमिशन देना| उस वक्त जब बीच मे कोई लटक जाये तो मैं कहती थी की,हमे फोन कीजिए, हम कहते थे की, ये ऑथेंटिकेट पर्सन है आपने देखा होगा की, जब मजूर – लेबर के झुंड निकलते थे और वो जब पैदल – पैदल आ रहे थे उस वक्त उन लोगो को लाना,अलग- अलग जगह पर रखकर कॉरोन टाईम करना फिर वहा पे वो इतने दिन रहेंगे तो उनके खाने -पिने की चीजे,वहा पे हमने टीव्ही लगा दिया खेलने को कुछ – कुछ चीजे,बच्चों को इंटरटेनमेंट यह सभी रेकॉर्ड रखना था| बसेस जा रही थी, ट्रेन जा रही थी तो यह बस- ट्रेन याहाँ रुकने वाली है| तो उनके खाने का प्रबंध कोई एनजीओ से करवाना |तो एन वक्त पर सब करना होता था बहुत सारे लोग उस पर काम कर रहे थे पर डेटा प्रिपेयर करना, उसका रेकॉर्ड रखना और ज्यादा से ज्यादा चीजों को देखना था और दुसरी बात यह कि हमारे लोगों का भी मॉरल उसमे कॉन्फिडन्स रखना था हमारे कुछ लोग जीने कोरोना हुआ था उस वक्त रात में हमारे सीपी उपाध्यक्ष सर और मैं सभी से बात करते थे| उनके बारे मे जानते थे उन्हे पूछते थे कि, वो कैसे है? उस वक्त उनका मॉरल बढाना भी हमारी जिम्मेदारी थी मुझे याद है की, अमरावती का हमारा कर्मचारी था मुझे मेरे फ्रेंड का फोन आया था की, यहा से हमारा एक कर्मचारी है उसको पहले ही लंग्ज का तकलीफ थाउसको मै खुद देखने गई उसका एक बच्चा था सब बोलते थे मॅडम दूर से देखिये| लेकिन मेरे बॅचमेट ने उसे भेजा था तो मेरा एक दायित्व मॉरल था की, क्यूकी क्या है, उसको कुछ हो जाता था तो वो युनिट के लोग डी- मॉरल हो जाते थे क्यूकी एक आदमी की जान जाने के बाद ; हमारे ऑफिसर ये हमारे लिए क्या कर रहे है? यह भावना जो है,इस पर बुरा प्रभाव पडा रहता आमदार निवास मे कोरण टाईम सेंटर था वहा हम विजिट देणे जाते थे तो वहा एक प्रेग्नेंट लेडी और उसके पती के बीच हमारे सामने झगडा हुआ तो हम वहा गये और उन्हे समझाया की, तुम्हे समझता नही क्या? तो उस वक्त हम इतने नजदीक चले गये थे और दुसरे दिन पता चला की, वो दोनो पॉझिटिव्ह है हमारा एक ऑफिसर आया और बोला की, मॅडम वे दोनो पॉझिटिव्ह आए हैं हमने कहाँ हमको कुछ नही होगा टेन्शन मत ले बस चिंता मतकर,कितना काम है ऐसा होता है कि, ये जो आदत है ना ; की कुछ हो रहा वहा पे,तो हम जाये वहा पे, हमारे डीएनए मे आ गया है वहाँ कुछ हुआ तो चुपचाप नही बैठे कोरोना मे ऐसा हुआ कि, हम तो बस देखते थे; हमारे लोग पाणी नही लेकीन बस ऐसे खडे है धूप में ये सब चीजे बहुत मुश्किल समय था उस वक्त सभी ने एकत्रित होके टीमवर्क किया मै तो चाहूंगी की जिंदगी मे फिर से वहँ समय ना आए बाहर से जब घर जाते थे तो ऐसा लगता था की हमारी वजह से घर के लोगों को कुछ ना हो जाये लेकिन वह समय चला गया और अभी तो बीस साल की सर्विस मे ये सब आदत हो गयी।
सवाल:- मॅडम आपने कई केसेस सुलझाया है ऐसा कोई विशेष केस जिसके माध्यम से आप बच्चो और समाज को कुछ बताना चाहेंगे?
जवाब :- महिलाओ – लडकियो -बच्चों को हमेशा से यही संदेश देती हु और एक किस्सा बताती हू की एक लडका और लडकी मिसिंग हो गये थे लडकी हमारे पोलीस कर्मचारी की थी और लडका सोनार था, कर्मचारी ने तो बताया नही की लडकी उसकी है बाद मे पता चला की ये दोनो एक साथ चले गए उस वक्त उस लडकी की मम्मी एडमिट थी फिर, हमने सारी इन्फॉर्मेशन निकाले बहुत जांच पड़ताल की सात – आठ दिन बाद वो दोनो के कपडे मिले तो फिर हमने लेबोरेट्री ब्लड एग्जामिन करवाया तो पता चला के वो कपड़े उन दोनों के ही थे फिर वो केस सॉल ही नही हो रहा था। घटना के वक्त लडके का जन्मदिन था तो वो दोनो जन्मदिन मनाने सांगली – जयसिंगपूर से 18 – 20 किलोमीटर दुरी पर कोल्हापूर लगता है वहां की टेकडी के साइड मे रोड के किनारे बैठ लडका – लडकी बर्थ-डे सेलिब्रेट कर रहे थे तब अचानक तीन-चार लडके आए और उन्हें जबरदस्ती पहाडी के चोटी पर ले गए उनकी गाड़ी कुएं में डाल दी लड़के को मार डाला और उसके पास जो बहुत सारा सोना था लूट लिए और लडकी का रेप कर उसको झाडीयो में मार कर डाल दिए, में लडकियों को यह समजाती हूं कि, आपके लिए पुलिस सदेव है पर कोई घटना न घटे इसलिए आपको किस जगा बैठना चाहिए इसकी सूज- बूज होनी चाहिए। किसको किसके साथ जाना है, रहना है जो भी है, यह बात अलग है लेकिन जब आपको जरासा भी लगे कि शायद वहां सेफ नही है तो आपको ना बोलना आना चाहिए क्युकी जाना ही नही वहां से कुशल पूर्वक आपको वापस भी आना है मै पेरेंट्स को भी हर बार यही बताती हूं कि, बच्चों से गलतियां होती है तो आप अगर बच्चों को एक्सेप्ट नही करोगे तो कोण करेगा? ऐसे में फिर उनके पास कोई चारा नही होता है, कुछ सुसाईड कर लेंगे या फिर कुछ और कर ले उनके साथी बनिए। एक तो यह बात है कि हमे पहले से ही हमारे बच्चों के लिए समय देना है उनको जब हमारी जरूरत है तब आपकी उपस्तिथि उनकी ताकत होती है। उनके साथ कुछ तो ऐसा रिश्ता होना चाहिए की, वे हमसे बुरे और अच्छे बातों को भी बेहिचक बता सके। साथ ही आज की परिस्थिती कॉम्पिटिशन से भरी है उसका तनाव भी एक कारण है। पर जब आप कोई भी रिलेशन मे मैं सेफ नही हो, सिक्योर नही हों उस जगह से मुझे एक तो ना बोलना आना चाहिए और वापस आ जाना चाहिए | इतना आपका प्रिपरेशन रहे ये जिंदगी मे आपको काम आयेगा। दुर्घटना या किसी अनहोनी से सर्वप्रथम आप खुद अपना बचाव करें पुलिस आपके लिए सदैव तत्पर है पर आपका जीवन अनमोल है।
सवाल -महिलाओ के प्रति सामाजिक भावना और सफल महिला दिवस को आप किस तरह से देखती है?
जवाब:- देखीए ८ मार्च इसलिये आया है कि, उस वक्त की जो परिस्थितीयाँ थी l ऊस परिस्थिती मे से उभरणे के लिए, महिलाओ ने जो कुछ भी कदम उठाए है उसको याद करने के लिए हम यह दिन मनाते है लेकिन मैं ऐसे चाहती हूं कि, नेसेसरी महिलाओं का दिन है इसीलिए हम महिलाओं का इंटरव्यू ले या महिलाओं के प्रति बात करे, असलियत में देखें तो महिलाओं के प्रति सम्मान करके ही समाज को एक नई दिशा दे सकते है, आपकी मां है, पत्नी है उसको मनाने के लिए आपकी जो डेली रुटीन है इस मे भी तो आप वर्क कर सकते है | सही बात ये एक सबसे इम्पॉर्टंट बात है | दुसरी बात आपकी बेटी है,आपकी बहन है,माँ है,जो कोई भी है | वो आपके लिए सभी चीजे हर बार करती है |आप भी उनके लिए हर बार कुछ करते है | कोई भी रिलेशन हो ऊस रिलेशन मे आप कुछ दे तभी कुछ लेने की हकदार है | यह जरुरी है | मै तो महिलाओं को यही बताऊंगी की, एक ही दिन मे नही होता हमारा तो बस आप कॉन्फिडेंटली काम करे,सुजबूज से काम करे | देखिए जिंदगी में बहुत सारे ऐसे- ऐसे अट्रॅक्शन आयेंगे | जैसे कोई लेडीज सिंगल होगी,अकेली होगी, या विडो होगी इन सभी चीजो मे हम गलत भी हो गये, हमे गलती भी हो गई, हमने हमारे पेरेंट को ये बताना चाहिए | यह इम्पॉर्टंट बात है |और पेरेंट को भी एक्सेप्ट करना चाहिए |आज रिलेशन पर बात नही होती | मै माँ – बाप को कैसे बताऊ ? एक दुसरी बात मेरे माता पिता मुझपर गुस्सा करेंगे? पर वहँ पेरेंट्स के सिवा कहा जाएगी? कही जा नही पाएगी ना उसे अपने अलावा रास्ता ही नही है | उस वक्त माँ – बाप ने उन्हे अपनाना चाहिए मै इस विचार की हू | तभी उस लडकी को आने वाले समय पर वहँ चुकेगी नही | उदाहरण के तौर पर समझो कि मै चालीस साल की और मेरी बच्ची है,या बहन है 15 साल की, कॉलेज गोइंग गर्ल है, या स्कूल गोइंग गर्ल है | वो जो गलती करने वाली है, मै चालीस साल मे नही करूंगी ; या कर भी दि मैं मेरे पेरेंट्स को जवाब देना है कि,ये जो एक इंटरनल बॉम्बिंग होती है ना ; तो ये ऐसे थोडी ना आ जाता है | तो वो रिश्ता डेव्हलप करना पडता है | तब जाके वो रिश्ता तयार होता है | मै बोलूंगी की सभी हो,लडका हो लडकी हो, पती-पत्नी हो, हर एक के इस मे एक तो वो लोगों को रिश्ता बनाना पडेगा | एक उसके लिए वो सबकुछ करना पडेगा | गलती हो भी गयी तो वो माफ करने का उतना बडा दिल होना चाहिए | या करना होगा, तभी जाके सामने वाला आदमी आपको हर बात बतायेगा | गलती भी होगी तभी मुझे ऐसा लगता है जादा तर हम लोग पडे लिखे है| एम ए,बी ए,मीडिया हमारे पास है |सब देखते है लेकिन उसमे से लेते क्या है?देखिए ऐसी – ऐसी चीजे होती है,समाज में अत्याचार होते है लडकियों के साथ लेकिन इसमे दोनो भी चीजे है | लडकियों को ना बोलना आना चाहिए | अपने पेरेंट्स को जो भी गलतीया हो वो बताने की हिम्मत होनी चाहिए | तभी जा के बच्चों को लगेगा की मैने गलती कर भी ली है,लेकिन मेरे पेरेंट्स ने मुझे समज लिया | क्यूकी उनकी इतनी उमर ही नही होती है | दुबारा गलती भी नही कर पायेगी सिख लेगें |
सवाल:- महिलाओ के प्रति वर्तमान स्थिती आप किस तरह से देखती है?और किन स्थितियों में आप सुधार चाहती है?और महिला और बच्चों के लिए क्या संदेश रहेगा?
जवाब :- मैं जिस माहौल में पली बड़ी हू, अपने माता पिता का धन्यवाद करती हु की मुझे सभी सुविधाए मिली आज भी मैं जहां भी हु खुशी है लोगों के लिए कार्य करती हु, मे समझती हु कि, आपके सपोर्ट चाहिए तो आप पर निर्भर करता है जैसे मुझे पता है की मेरी मम्मी को ये काम करना पसंद नही उसे तकलीफ होती है तो वो काम मैं कर लेती हु जैसे मेरी मम्मी को बर्तन लगाना पसंद नही वो काम में कर लेती थी लेकिन जैसे मेरी पढाई करके हो गई उस वक्त मै ये सब काम करती थी जैसे आटा बूना है हर बात रिलेशन पे आती है आप अगर मम्मी के लिए कुछ करेंगे जरुरी नही है कि उन्होंने भी सब आपके लिए करना चाहिए तो मै सभी को यही बोलूंगी की, लगता है की परिस्थिती मेरे फेवर में होनी चाहिए तो आपको भी वैसा ही मेहनत और आचरण करना आना चाहिए ताकी सभी चीजे आपके फेवर मे होगी वैसे ही आप अगर बाहर जाते है आपको अपना मोबाइल संभालते आता है उसकी इंपोर्टेंस है तो खुदकी क्यू नही कोई लडका आपको चेस करे तो पसंद नही है तो वो अपने पेरेंट्स को बताना चाहिए आपको खुद को अवेयर रखना है और आज कल ऐसा नही है, सभी लेडीज जो है अगर मोबाईल पर रील, फोटो, वीडियो बनाना जानती है तो टेक्निकली आप बोलोगे क्या मै अवेयर नही हू? अगर आपको आवाज उठानी है तो आज सभी चीजे आपके पास अवेलेबल है तो सभी अच्छी बाते है बुरी बाते है लेकिन क्या आपको लेना है? यह सूज – बूझ तो आपकी है | अभी आप मुझको बताए अगर आपको कोई चेस करे तो आप 100 नंबर लगा सकते है 112 लगा सकते है? मै किसी का ऐसे व्हिडिओ निकाल सकती हू, जिससे ये सब बंद हो सकता है सोशल मीडिया वैसे भी अवेलेबल है। ये होना चाहिए लेकिन मेरी माँ हॉस्पिटल मे है और मै उस लडके के साथ जाती हूँ और मेरा मर्डर हो जाता है ठीक है आप फ्रेंड है, फ्रेंड होना या नही होना यह कोई बुरी बात नही है लेकिन उसके साथ उस जगा जाओगे जहा कोई नही है मर्डर हो गया तो आप किसको दोष दोंगे? इसलिए, “सजग रहीए जागृत रहीए” आपमें शक्ति है अपने शक्ति को पहचाने अपने सामर्थ्य को बढ़ाए, अपने कार्य और उद्देश पर ध्यान दे और जीवन को ऐसा बनाए की आपके परिवार को आप पर गर्व हो। यही संदेश महिलाओं को जागतिक महिला दिन पर देना चाहूंगी।