रवि भवन की इमारतों में मरम्मत के बाद फिर सीलिंग से टपकने लगा पानी!
सरकारी धन से हुए मरम्मत कार्य की गुणवत्ता पर उठे गंभीर सवाल,
क्या जिम्मेदार अभियंताओं और अधिकारियों की कार्यप्रणाली की होगी जांच?
नागपुर, 20 जुलाई 2026।
नागपुर स्थित रवि भवन परिसर में कुछ समय पहले सरकारी धनराशि खर्च कर
कराए गए मरम्मत कार्य के बावजूद अब एक बार फिर इमारतों की सीलिंग से
पानी टपकने की बात सामने आने से लोक निर्माण विभाग (PWD) के संबंधित
अभियंताओं और जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े
हो गए हैं।
बताया जा रहा है कि रवि भवन परिसर की कुछ इमारतों में पहले दीमक और
अन्य कारणों से क्षति होने के बाद मरम्मत कार्य कराया गया था।
इस मरम्मत कार्य पर सरकारी खजाने से बड़ी राशि खर्च किए जाने की जानकारी
सामने आई थी।
लेकिन अब मरम्मत कार्य पूरा होने के कुछ ही समय बाद संबंधित इमारतों की
सीलिंग से फिर पानी टपकने की शिकायत सामने आना अत्यंत गंभीर विषय है।
सवाल यह है कि यदि मरम्मत कार्य सही तरीके से किया गया था तो इतनी जल्दी
सीलिंग से पानी टपकने की स्थिति क्यों उत्पन्न हुई?
क्या मरम्मत कार्य के दौरान छत, जलरोधक व्यवस्था और सीलिंग की गुणवत्ता
की उचित जांच की गई थी?
क्या कार्य पूर्ण होने से पहले संबंधित PWD अभियंताओं ने मौके का निरीक्षण
करके कार्य की गुणवत्ता का परीक्षण किया था?
क्या कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र जारी करने से पहले सभी आवश्यक परीक्षण किए
गए थे?
यदि परीक्षण किए गए थे तो अब फिर सीलिंग से पानी टपकने का कारण क्या है?
क्या यह खराब गुणवत्ता की निर्माण सामग्री का परिणाम है?
क्या ठेकेदार द्वारा निर्धारित मानकों के अनुसार कार्य किया गया था?
क्या संबंधित अभियंताओं ने कार्य की गुणवत्ता पर पर्याप्त निगरानी रखी थी?
या फिर सरकारी धन खर्च करने के बाद कार्य की गुणवत्ता की वास्तविक जांच
केवल कागजों तक ही सीमित रह गई?
रवि भवन में मंत्रियों और महत्वपूर्ण अतिथियों के लिए उपयोग की जाने वाली
इमारतों में यदि मरम्मत के बाद भी पानी टपक रहा है तो यह PWD विभाग की
कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।
जनता के पैसों से होने वाले प्रत्येक सरकारी निर्माण और मरम्मत कार्य की
गुणवत्ता की जिम्मेदारी संबंधित विभाग के अभियंताओं और अधिकारियों की होती है।
ऐसे में यह जानना आवश्यक हो जाता है कि पूर्व में कराए गए मरम्मत कार्य की
निगरानी किस अधिकारी और किस अभियंता ने की थी।
कार्य का अनुमान किसने तैयार किया था?
तकनीकी स्वीकृति किस अधिकारी ने दी थी?
कार्य का निरीक्षण किस अभियंता ने किया था?
कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र किस अधिकारी द्वारा जारी किया गया था?
ठेकेदार को भुगतान किस आधार पर किया गया था?
क्या भुगतान से पहले कार्य की गुणवत्ता का स्वतंत्र परीक्षण किया गया था?
यदि किया गया था तो उसकी रिपोर्ट कहां है?
क्या मरम्मत कार्य में दी गई गारंटी और दोष दायित्व अवधि अभी समाप्त हुई है?
यदि दोष दायित्व अवधि अभी समाप्त नहीं हुई है तो क्या संबंधित ठेकेदार के
विरुद्ध कार्रवाई की गई है?
क्या ठेकेदार से खराब कार्य की मरम्मत अपने खर्च पर कराने की मांग की गई है?
या फिर सरकारी धन से दोबारा मरम्मत कराने की तैयारी की जा रही है?
यदि पहले ही सरकारी धन खर्च करके मरम्मत कार्य कराया गया था तो अब फिर
उसी इमारत में पानी टपकने की समस्या क्यों उत्पन्न हुई?
यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि पहले किए गए मरम्मत कार्य में वास्तव में कौन-कौन से काम किए गए थे।
क्या छत की वाटरप्रूफिंग की गई थी?
क्या सीलिंग की मरम्मत की गई थी?
क्या पाइपलाइन और जल निकासी व्यवस्था की जांच की गई थी?
क्या दीमक नियंत्रण का स्थायी उपचार किया गया था?
इन सभी कार्यों पर कितनी राशि खर्च की गई थी?
क्या पुराने कार्य की गुणवत्ता की जांच के बाद ही नया मरम्मत कार्य शुरू किया गया है?
यदि पहले का कार्य असफल साबित हुआ है तो उसके लिए जिम्मेदारी किसकी है?
जनता के पैसों से होने वाले कार्यों में लापरवाही किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं की जा सकती।
सरकारी विभागों में अभियंताओं और अधिकारियों को लाखों-करोड़ों रुपये के कार्य की निगरानी की जिम्मेदारी दी जाती है।
ऐसे में कार्य पूरा होने के कुछ ही समय बाद निर्माण या मरम्मत में गंभीर खामियां सामने आना जांच का विषय बन जाता है।
रवि भवन की इमारतों में पानी टपकने की शिकायत को केवल छोटी तकनीकी
समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
इस पूरे मामले में पूर्व में हुए मरम्मत कार्य की फाइलों की जांच की जानी चाहिए।
कार्य का अनुमान, तकनीकी स्वीकृति, निविदा प्रक्रिया, कार्य आदेश,
माप पुस्तिका, बिल, भुगतान अभिलेख और कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र की जांच
की जानी चाहिए।
साथ ही संबंधित अभियंताओं द्वारा किए गए निरीक्षण की रिपोर्ट भी सार्वजनिक
की जानी चाहिए।
यह भी जांच का विषय है कि जिस कार्य पर सरकारी धन खर्च किया गया था,
उसकी गुणवत्ता की जिम्मेदारी किस अधिकारी की थी।
यदि जांच में लापरवाही, घटिया सामग्री या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती
है तो जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदार के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई
की जानी चाहिए।
साथ ही यदि सरकारी धन से दोबारा उसी कार्य पर राशि खर्च की जाती है तो
पहले हुए कार्य की जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए।
जनता यह जानना चाहती है कि सरकारी धन का सही उपयोग हुआ या नहीं।
रवि भवन जैसे महत्वपूर्ण सरकारी परिसर में मरम्मत कार्य के बाद फिर पानी
टपकना विभागीय निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण व्यवस्था पर गंभीर सवाल है।
इस मामले में उच्च अधिकारियों द्वारा तत्काल स्थल निरीक्षण कराया जाना
आवश्यक है।
पूर्व और वर्तमान दोनों मरम्मत कार्यों की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जानी
चाहिए।
जांच पूरी होने तक संबंधित अभिलेखों को सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
सार्वजनिक धन से हुए कार्यों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना
सरकार और संबंधित विभाग की जिम्मेदारी है।
विदर्भ नंदन समाचार मांग करता है कि रवि भवन के पूर्व मरम्मत कार्य और
वर्तमान शिकायत की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
संबंधित PWD अभियंताओं और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच की जाए।
यदि किसी स्तर पर लापरवाही पाई जाती है तो दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाए।
साथ ही जनता को यह जानकारी दी जाए कि पहले हुए मरम्मत कार्य पर कितना
सरकारी धन खर्च हुआ और उसकी गुणवत्ता की जिम्मेदारी किसकी थी |
सरकारी धन जनता की मेहनत की कमाई से प्राप्त होता है।इसलिए सरकारी भवनों के रखरखाव में किसी भी प्रकार की लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।
अब देखना यह है कि रवि भवन की इमारतों में फिर पानी टपकने की शिकायत पर
PWD विभाग के वरिष्ठ अधिकारी क्या कार्रवाई करते हैं।
क्या जिम्मेदार अभियंताओं से जवाब मांगा जाएगा?क्या पूर्व मरम्मत कार्य की गुणवत्ता की जांच होगी?या फिर सरकारी धन से एक बार फिर मरम्मत कराकर मामले को समाप्त कर दिया जाएगा?
इन सवालों का जवाब अब संबंधित विभाग और जिम्मेदार अधिकारियों को देना होगा।
— विदर्भ नंदन समाचार




